गुमशुदा कविता की तलाश

By: Suman
Wed, 02/05/2012 - 13:42

खो गई है मेरी कविता पिछले दो दशको से. वह देखने में, जनपक्षीय है कंटीला चेहरा है उसका जो चुभता है, शोषको को. गठीला बदन, हैसियत रखता है प्रतिरोध की. उसका रंग लाल है वह गई थी मांगने हक़, गरीबों का. फिर वापस नहीं लौटी, आज तक. मुझे शक है प्रकाशकों के ऊपर, शायद, हत्या करवाया गया है सुपारी देकर. या फिर पूंजीपतियो द्वारा सामूहिक वलात्कार कर, झोक दी गई है लोहा गलाने की भट्ठी में. कहाँ-कहाँ नहीं ढूंढा उसे शहर में.... गावों में... खेतों में.. और वादिओं में..... ऐसा लगता है मुझे मिटा दिया गया है, उसका बजूद समाज के ठीकेदारों द्वारा अपने हित में. फिर भी विश्वास है लौटेगी एक दिन मेरी खोई हुई कविता. क्योंकि नहीं मिला है हक़..... गरीबों का. हाँ देखना तुम वह लौटेगी वापस एक दिन, लाल झंडे के निचे संगठित मजदूरों के बिच, दिलाने के लिए उनका हक़.